Author(s): प्रो. गणेश बी. पवार
Abstract:
भारतीय साहित्य की बहुवर्णी परंपरा में कुछ ऐसे साहित्यकार होते हैं, जिनकी रचनात्मक उपस्थिति किसी एक भाषा या क्षेत्र की सीमा में आबद्ध नहीं रहती, बल्कि वे संस्कृति, चेतना और संवेदना के ऐसे सेतु बन जाते हैं जो विविध भाषाओं और समाजों को एक साझा मानवीय मंच पर ला खड़ा करते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्वों में दत्तात्रेय रामचंद्र बेन्द्रे का नाम अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। वे केवल कन्नड़ साहित्य के प्रतिनिधि कवि नहीं थे, बल्कि संपूर्ण भारतीय काव्य-परंपरा के एक प्रखर, मौलिक और उदात्त स्वर भी थे। बेन्द्रे का काव्य किसी भाषा की सीमा में बँधने वाला नहीं है। उसमें भारतीय लोकजीवन की गंध, आध्यात्मिक ध्वनि, और दार्शनिक अनुभूति इतनी सहजता से समाहित है कि वह समस्त भाषिक पाठकों को आत्मीय प्रतीत होती है। उनकी रचनाओं में जहां एक ओर वेदान्त, उपनिषदों, और संत-साहित्य की गूंज सुनाई देती है, वहीं दूसरी ओर लोकगीतों, कर्नाटक संगीत, और ग्रामीण जीवन की सजीव अनुभूतियाँ झलकती हैं। इस प्रकार, वे साहित्य के उस दुर्लभ संतुलन को साकार करते हैं जहाँ गंभीरता और सरलता, गाम्भीर्य और गेयता, और तत्त्व और रस का अद्वितीय संयोग होता है। बीसवीं शताब्दी का भारत सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से जिस संक्रमणकाल से गुज़रा, उसमें कई साहित्यकारों ने अपनी-अपनी भाषाओं में उस चेतना को स्वर दिया। परंतु जो कुछ कवि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक बनकर उभरे, उनमें बेन्द्रे की गणना निःसंदेह की जाती है। वे अपने समय की हलचलों के सजग दर्शक तो थे ही, साथ ही मानव आत्मा के शाश्वत प्रश्नों के उत्तर खोजने वाले भी थे।
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