“संयम, शील और तप के आलोक में सम्यक्चारित्र: श्रावक जीवन का व्यावहारिक दृष्टि से विश्लेषण”

Author(s): कल्पना जैन

Abstract:

जैन दर्शन भारतीय चिंतन परंपरा का एक अत्यंत समृद्ध आयाम है, जो जीवन के प्रत्येक पक्ष में आत्म-विकास, अनुशासन और नैतिकता का पथ प्रशस्त करता है। जैन धर्म का प्रमुख उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति है, और इसके लिए श्रावक (गृहस्थ अनुयायी) को संयम, शील और तप के मार्ग पर चलने का उपदेश दिया गया है। यह शोध पत्र श्रावक जीवन में सम्यक चरित्र के निर्माण में इन तीन मूल्यों की व्यावहारिक भूमिका का विश्लेषण करता है। भारतीय धार्मिक परंपरा में जैन धर्म का एक विशेष स्थान है, जिसने आत्मशुद्धि, अहिंसा, और संयम को अपने सिद्धांतों की आधारशिला बनाया है। जैन धर्म का मूल उद्देश्य आत्मा की मुक्ति है, और इस मार्ग पर चलने वाले दो प्रमुख वर्ग माने गए हैं - मुनि (संन्यासी) और श्रावक (गृहस्थ)। जहाँ मुनियों का जीवन पूर्ण वैराग्य और त्याग का प्रतीक होता है, वहीं श्रावकों का जीवन एक व्यवहारिक धर्म-पथ है, जो सांसारिक जीवन जीते हुए भी आध्यात्मिक शुद्धि की ओर अग्रसर होता है। श्रावक जीवन केवल उपासना या धार्मिक कर्तव्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आत्म नियंत्रण, आचारसंहिता और मानसिक अनुशासन का जीवन है। इस जीवन में तीन प्रमुख मूल्य संयम, शील और तप -एक त्रिकेंद्र बनाते हैं, जिसके चारों ओर सम्यक चरित्र की रचना होती है। ये तीनों तत्व न केवल आध्यात्मिक उन्नति के साधन हैं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जीवन के भी मजबूत स्तंभ हैं।

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