स्त्री विमर्श – स्वरूप और आवश्यकता

Author(s): मन्सूर अली. तेट्टु

Abstract:

आधुनिक युग में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक परिवेश में आए तीव्र परिवर्तनों ने स्त्री के जीवन, उसकी स्थिति और समाज में उसके प्रति दृष्टिकोण को गहन रूप से प्रभावित किया है। स्त्री-विमर्श इसी परिवर्तनशील परिदृश्य की उपज है, जो स्त्री के अस्तित्व, उसकी समस्याओं और उसकी स्वायत्तता को केंद्र में रखकर एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह न केवल नारीवाद का सैद्धांतिक विमर्श है, अपितु एक ऐसी मानवीय दृष्टि है जो पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देती है और स्त्री की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता की वकालत करती है। भारत में स्त्री-विमर्श का विकास राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और वैश्विक नारीवादी चेतना के समन्वय से हुआ, जिसने स्त्री को अपने अधिकारों और अस्मिता के प्रति जागरूक किया। यह निबंध स्त्री-विमर्श के स्वरूप, इसके विकास, विशेषताओं, आवश्यकता और सामाजिक-साहित्यिक प्रभाव का विश्लेषण करता है, ताकि इसकी प्रासंगिकता और मानवीय सरोकारों स्पष्ट किया जा सके।

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