काश्मीर शैवदर्शन में बन्धन का स्वरूप: एक दार्शनिक विमर्श

Author(s): डॉ. अनुपम आनन्द

Abstract:

प्रस्तुत शोधपत्र काश्मीर शैवदर्शन में बन्धन की अवधारणा का आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अनुशीलन प्रस्तुत करता है। यहाँ बन्धन को अविद्या अथवा मिथ्यात्व का परिणाम न मानकर परमशिव के स्वातन्त्र्यस्वरूप आत्म-संकोच का प्रकटीकरण स्वीकार किया गया है। शोध का प्रमुख प्रतिपाद्य यह है कि यदि बन्धन परमशिव की स्वेच्छया सम्पन्न लीला है, तो बन्धन एवं मोक्ष के मध्य प्रतिपादित द्वैत का तात्त्विक औचित्य किस सीमा तक युक्तिसंगत है। इस सन्दर्भ में मलत्रय की बन्धनकारक सत्ता का समालोचनात्मक परीक्षण किया गया है। यह प्रश्न भी समीक्षित किया गया है कि यदि बन्धन स्वेच्छया स्वीकृत अवस्था है, तो दीक्षा, प्रत्यभिज्ञा, शक्तिपात एवं साधनोपायों की अनिवार्यता का दार्शनिक औचित्य किस प्रकार सिद्ध होता है।

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