Author(s): डॉ० मीनाक्षी कोठारी, डॉ० गिरीश पाठक
Abstract:
आधुनिक समय में योग स्वास्थ्य के लिए जितना लाभप्रद है, उतना ही यौगिक क्रियाओं को करने से पूर्व शारीरिक एवं मानसिक रूप से शुद्धिकरण भी आवश्यक है। जिसके लिए शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों अथवा दोषों को बाहर निकालने के लिए योग की प्रथम अवस्था हठ यौगिक ग्रन्थों में वर्णित यौगिक षट्कर्म क्रिया है। इन षट्कर्मों के अभ्यास से शरीर की शुद्धि होती है। इनका प्रयोजन केवल शरीर की शुद्धि ही नहीं, वरन् आत्म-शुद्धि भी है, क्योंकि शरीर की शुद्धि के साथ-साथ जब हमारे भीतर से विकार दूर होने लगते हैं, तब स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। बिना शुद्धि के शरीर योग के उच्च अभ्यासों के लिए तैयार भी नहीं हो पायेगा। शुद्धि के पश्चात् मनुष्य दीर्घायु हो जाते हैं। षट्कर्म शारीरिक एवं मानसिक रूप से शरीर से दोषों का निर्हरण करते हैं तथा त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) को साम्यावस्था में लाने का भी कार्य करते हैं। षट्कर्म अर्थात् ‘छः कर्म‘ हठयोग में बतायी गयी छः क्रियाऐं हैं। षटकर्म द्वारा सम्पूर्ण शरीर की शुद्धि होती है एवं देह निरोग रहता है।
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