विश्वगुणादर्श चम्पूकाव्य में तीर्थ वर्णन – एक समालोचनात्मक अध्ययन

Author(s): श्वेता पाण्डेय, प्रो. आशा रानी पाण्डेय

Abstract:

भारतीय संस्कृति में तीर्थ केवल भौगोलिक स्थल नहीं अपितु आस्था, अध्यात्म, शुद्धि और मोक्ष का सजीव केंद्र है । ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ है “तरति पापादिकम् यस्मात्” अर्थात जिसके द्वारा मनुष्य पापादि से मुक्त हो जाए उसी को ‘तीर्थ’ की संज्ञा दी जाती है । पद्यम पुराण में ‘तीर्थ’ के विषय में उद्धृत है – “यथाशरीरस्योद्देशाः केचिन्मेध्यतमाः स्मृताः । तथा पृथिव्यामुद्देशाः केचित् पूण्यतमाः स्मृताः ।।” (पद्मपुराण (उ०ख० २३७/२५) (अर्थात जिस प्रकार अंग विशेष सर्वाधिक पवित्र माने गये है उसी प्रकार पृथ्वी के भी स्थान विशेष अधिक पवित्र माने गये है, जो तीर्थ नाम से जाने जाते है।)

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