व्यक्तित्व विकास में पंचकोशों की उपादेयता

Author(s): डॉ.देवेश शर्मा

Abstract:

आधुनिकीकरण और मशीनीकरण के इस युग में छात्रों के व्यक्तित्व को एक नई दिशा देने के लिए पंचकोश शिक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। छात्र हमारे देश, समाज और परिवार का भविष्य हैं और इस भविष्य को सुरक्षित, सशक्त एवं व्यवस्थित बनाने के लिए उनके सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। पंचकोश की शिक्षा छात्रों को न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाती है, बल्कि उन्हें मानसिक शांति, आत्मसंतोष और आंतरिक आनंद भी प्रदान करती है। यह शिक्षा बच्चों को अपने शरीर, मन और बुद्धि को पहचानने और नियंत्रित करने की दिशा में मार्गदर्शन करती है, जिससे वे जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास और संतुलन के साथ कर पाते हैं। बच्चों के व्यक्तित्व में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं – चाहे वह शारीरिक विकास हो, बौद्धिक क्षमता में वृद्धि हो या भावनात्मक उतार-चढ़ाव। कई बार इन परिवर्तनों के कारण उनमें उदासी, निराशा या क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाएँ भी देखने को मिलती हैं, जिससे आपसी टकराव या वैमनस्य की स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। ऐसे समय में पंचकोश शिक्षा बच्चों के समग्र विकास का एक व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करती है।

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