स्वस्थ वृद्धावस्था के संवर्धन में योग की भूमिका : पारंपरिक योगदृष्टि एवं आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों का समीक्षात्मक अध्ययन

Author(s): डॉ. विक्रम सिंह कण्डारी

Abstract:

वृद्धावस्था मानव जीवन की एक स्वाभाविक एवं अपरिहार्य अवस्था है। आयु बढ़ने के साथ शरीर की कार्यक्षमता, मांसपेशीय शक्ति, संतुलन, लचीलापन, स्मरणशक्ति तथा मानसिक स्वास्थ्य में परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं। आधुनिक जीवनशैली, शारीरिक निष्क्रियता, सामाजिक एकाकीपन तथा विभिन्न दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ वृद्धावस्था की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में स्वस्थ एवं सक्रिय वृद्धावस्था के लिए सुरक्षित, सरल, कम खर्चीली तथा जीवनशैली के अनुकूल उपायों की आवश्यकता है। योग भारतीय ज्ञान परंपरा की एक समग्र साधना-पद्धति है, जिसमें शरीर, श्वास, मन, आचरण एवं आत्म-जागरूकता को महत्व दिया गया है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य स्वस्थ वृद्धावस्था के संवर्धन में योग की भूमिका का पारंपरिक योगदर्शन तथा आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के आधार पर समीक्षात्मक अध्ययन करना है। इसके लिए पतञ्जलि योगदर्शन, भगवद्गीता तथा हठयोग परंपरा के प्रमुख ग्रंथों के साथ-साथ योग एवं वृद्धावस्था से संबंधित प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों और व्यवस्थित समीक्षा-विश्लेषणों का अध्ययन किया गया है। उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों से संकेत मिलता है कि नियमित एवं उपयुक्त योगाभ्यास वृद्धजनों में संतुलन, लचीलापन, मांसपेशीय शक्ति, शारीरिक कार्यक्षमता तथा मानसिक स्वास्थ्य के कुछ आयामों में लाभकारी हो सकता है। पंद्रह अध्ययनों पर आधारित एक व्यवस्थित समीक्षा में संतुलन, लचीलेपन, मांसपेशीय शक्ति तथा अवसाद संबंधी लक्षणों में सकारात्मक प्रभाव पाए गए, यद्यपि विभिन्न अध्ययनों के बीच पर्याप्त विविधता भी पाई गई। वृद्धजनों में योग एवं संज्ञानात्मक कार्यक्षमता से संबंधित शोधों में भी स्मृति, कार्यकारी कार्य तथा ध्यान जैसे क्षेत्रों में संभावित लाभ के संकेत प्राप्त हुए हैं। योग को स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए एक संभावित समग्र एवं पूरक पद्धति के रूप में देखा जा सकता है।

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