Author(s): Dr. Parshotam Dass
Abstract:
संस्कृत व्याकरण में कारकों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वाक्यविज्ञान की दृष्टि से कारकों का ज्ञान अपरिहार्य है। ‘‘आख्यातोपयोगे’’ सूत्रप्रोक्त- ‘उपाध्यायात् शृणोति’ तथा ‘नटस्य शृणोति’ इत्यादि उदाहरणजनित विभक्ति भेद से वाक्यार्थ में कैसे भेद हो जाता है- यह सभी वैयाकरणों को सुविदित है। यूँ तो इस कारक की अनेक परिभाषाएँ दी जाती हैं किन्तु कारक की सर्वमान्य परिभाषा है- ‘‘क्रियानिष्पादकत्वं कारकत्वम्’’ अर्थात् क्रिया के निष्पादक धर्म का नाम कारक है। दूसरे शब्दों में - संज्ञा, सर्वनाम या विषेषण का जो क्रिया के साथ सम्बन्ध होता है, वह कारक कहलाता है। ‘‘करोतीति कारकम्’’ यह कारक शब्द का भाष्यप्रोक्त अन्वर्थ निर्वचन भी इस विषय में उपोद्बलक है। वास्तव में कारक और क्रिया में अविनाभाव सम्बन्ध होता है। अतः जैसे कारक की परिभाषा में क्रिया का होना अनिवार्य होता है वैसे ही क्रिया की परिभाषा भी कारक से ही पूरी होती है।
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