Author(s): डॉ.नीरज शर्मा
Abstract:
भारतीय मनीषा और ज्ञान-परम्परा में 'योग' को केवल एक शारीरिक पद्धति या व्यायाम मात्र मानना इसके विशाल एवं गम्भीर दार्शनिक स्वरूप को सीमित करना है। महर्षि पतञ्जलि से लेकर श्रीमद्भगवद्गीता तक, योग को मानव जीवन के दुखों, संतापों और क्लेशों के आत्यन्तिक निवारण का सर्वोच्च मार्ग बताया गया है। गीता का यह शाश्वत उद्घोष—युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य "योगो भवति दुःखहा"।।—न केवल दार्शनिक चिन्तन का विषय है, बल्कि यह आधुनिक अशान्त, तनावग्रस्त और भौतिकतावादी युग में प्रत्येक मनुष्य के लिए जीवन-दर्शन और उपचार का एक अचूक सूत्र है।
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