पाणिनि व्याकरण और ज्योतिष का अन्तःसम्बन्ध

Author(s): डॉ.नीरज शर्मा

Abstract:

भारतीय मनीषा में कहा गया है: 'मुखं व्याकरणं स्मृतम्' और 'ज्योतिषामयनं चक्षुः'। यदि व्याकरण इस ज्ञान-पुरुष का मुख है, तो ज्योतिष उसके नेत्र हैं। बिना मुख के शब्द की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं और बिना नेत्र के काल के स्वरूप को देख पाना असम्भव है। महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी को प्रायः केवल भाषा का अनुशासन माना जाता है, परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो यह खगोल विज्ञान (Astronomy) की परिभाषाओं का भी मूल है। जब पाणिनि 'नक्षत्रेण युक्तः कालः' कहते हैं, तो वे केवल प्रत्यय नहीं समझा रहे होते, बल्कि वे उस खगोलीय घटना को व्याकरण से सिद्ध कर रहे होते हैं जिसके आधार पर हमारे महीनों और तिथियों का निर्धारण होता है। यह शोध पत्र इस तथ्य की विवेचना करता है कि किस प्रकार महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी ज्योतिष शास्त्र के तकनीकी शब्दों, काल-गणना और खगोलीय घटनाओं की व्याख्या हेतु आधारभूत ढाँचा प्रदान करती है। "शब्दशास्त्र" और "कालशास्त्र" का यह सङ्गम भारतीय ज्ञान परम्परा की वैज्ञानिकता को सिद्ध करता है।

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