International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN No. : XXXX – XXXX
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline : +91 – 8368 241 690
Mail to Editor: [email protected]
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Author(s): डॉ. श्याम सुन्दर पाल, डॉ. अशोक भास्कर
कुंडलिनी योग और तंत्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह माने जाने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है, जो कि प्रत्येक व्यक्ति के आधार चक्र (मूलाधार चक्र) में सुप्त अवस्था में स्थित होती है। कुंडलिनी ऊर्जा का जागरण, साधक की आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ माना जाता है। जब यह ऊर्जा जाग्रत होती है, तो यह सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊपर की ओर बढ़ती है और विभिन्न चक्रों (ऊर्जा केंद्रों) को पार करते हुए सहस्रार चक्र (मस्तिष्क के शीर्ष) तक पहुँचती है। कुंडलिनी जागरण से व्यक्ति को अनेक प्रकार की आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जैसे कि ज्ञान, शांति, और आनंद का अनुभव। इसके लिए विभिन्न योग, ध्यान, और प्राणायाम की विधियों का उपयोग किया जाता है। कुंडलिनी को जागृत करने का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकता को प्राप्त करना होता है। कुंडलिनी वह छिपी हुई दिव्य शक्ति है , जिसका जागरण मनुष्य को उसकी उच्चतम चेतन और आत्मिक अनुभूति तक पहुंचाता है।