International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डॉ. पंकज मरमट
प्रकृति और पर्यावरण से हमारा अटूट रिश्ता है। हम इसी की गोद में पैदा होता है और क्रियाकलापों को करते हैं। प्रकृति के बिना हम अपने अस्तित्व के विषय में सोच भी नहीं सकते हैं। इसी प्रकृति की महत्ता को प्राचीन कवियों ने भी स्वीकार किया है। अनेक कवियों ने अपने काव्यों में, नाटकों में प्रकृति के सौन्दर्य को सजाया और संवारा है। उन्होंने अपने काव्यों में प्रकृति के बाह्य और आन्तरिक रूप का वर्णन बहुत ही सुन्दरता से किया है। प्राचीन कवियों में महाकवि कालिदास का अपना अद्वितीय स्थान रहा है। उनका साहित्य एक ऐसा अनुपम रत्न-राशि है, जिसका अनुकरण कर परवर्ती साहित्यकारों ने अपने काव्य सम्पदा को समृद्ध बनाया है। महाकवि कालिदास न केवल एक अद्वितीय काव्यकार थे अपितु गीतकार व नाटककार भी थे। कालिदास के लिए एक उक्ति अत्यन्त प्रसिद्ध है ‘‘उपमा कालिदासस्य’’ कालिदास की उपमाएँ सुन्दर, सरस एवं स्वाभाविक है। उनकी उपमाएँ अन्तर्जगत तथा बाह्य जगत दोनों क्षेत्र से सम्बन्ध रखती है। कालिदास प्रकृति प्रेमी थे। यह जगत में सर्वविदित है। कालिदास के काव्यों में प्रकृति के प्रति उनके स्नेह और प्रेम का पता चलता है। उनके द्वारा सात रचनाएँ लिखी है। जिनमें तीन नाटक - अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, दो महाकाव्य - रघुवंशम्, कुमारसम्भवम् तथा दो गीतिकाव्य - मेघदूतम्, ऋतुसंहार है। उन्होंने अपने महाकाव्यों में भी प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का वर्णन किया है।