International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
Author(s): सुकृति दीक्षित, प्रो. आशारानी पाण्डेय
परिचय: ‘ धर्मो हि दण्डरूपेण ब्रह्मणा निर्मितः पुरा ‘ । याज्ञवल्क्य स्मृति (1/354 )याज्ञवल्क्य स्मृति हिन्दू धर्मशास्त्र की एक महत्वपूर्ण स्मृति है, जो धर्म और कानून से संबंधित है। इसे अपने तरह की सबसे अच्छी एवं व्यवस्थित रचना माना जाता है। इसकी विषय-निरूपण-पद्धति अत्यंत सुग्रथित है । इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। इस स्मृति में आचरण, व्यवहार और प्रायश्चित के तीन अलग-अलग भाग हैं । दूसरी ओर, भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय दंड संहिता, 1860 का स्थान लेती है और भारत में आपराधिक अपराधों को परिभाषित और दंडित करती है । यह 1 जुलाई, 2024 से लागू हो गई है । इसका मुख्य उद्देश्य न्याय प्रदान करना है । यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी और द्वारका से असम तक पूरे देश में एक ही न्याय व्यवस्था लागू हो । ये दोनों ही ग्रंथ अपने-अपने ऐतिहासिक संदर्भों में मूलभूत कानूनी ढांचे के रूप में कार्य करते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति ने प्राचीन भारत में धर्म और सामाजिक व्यवस्था पर जोर देते हुए एक व्यापक कानूनी और सामाजिक संहिता प्रदान की, जबकि भारतीय न्याय संहिता स्वतंत्र भारत के लिए आधुनिक समकक्ष है, जो न्याय पर ध्यान केंद्रित करती है और समकालीन मूल्यों को दर्शाती है। मिताक्षरा की महत्वपूर्ण भूमिका याज्ञवल्क्य स्मृति के लिए और भारतीय दंड संहिता का भारतीय न्याय संहिता द्वारा प्रतिस्थापन इन दोनों की संबंधित प्रभावशीलता को दर्शाता है। भारतीय न्याय संहिता का उद्देश्य पूरे भारत में एक एकीकृत न्याय प्रणाली स्थापित करना है, जो स्मृति कानूनों के संभावित स्थानीयकृत अनुप्रयोग के विपरीत है।
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य याज्ञवल्क्य स्मृति में वर्णित दण्ड विधान और भारतीय न्याय संहिता के दंड प्रावधानों की तुलना करना है। यह तुलना दोनों कानूनी प्रणालियों की समानताओं, अंतरों और ऐतिहासिक विकास को समझने में सहायक होगी। इसके अतिरिक्त, यह प्राचीन भारतीय कानूनी विचारों के आधुनिक भारतीय कानून पर प्रभाव का विश्लेषण करेगा और आधुनिक भारतीय न्याय प्रणाली के संदर्भ में याज्ञवल्क्य स्मृति के दण्ड विधान की प्रासंगिकता का मूल्यांकन करेगा। प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक संहिताओं तक कानूनी विचारों के विकास को समझना न्याय प्रणालियों के विकास और ऐतिहासिक कानूनी सिद्धांतों की स्थायी प्रासंगिकता में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह समाजों द्वारा व्यवहार को विनियमित करने और व्यवस्था बनाए रखने के तरीकों में परिवर्तनों और निरंतरताओं की सराहना करने में भी मदद करता है।