International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): सविता उदावत
हल्दीघाटी युद्ध व युद्ध स्थल का विशेष महत्व रहा है इसका नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में प्रताप की तेजस्वी मूर्ति उभर कर सामने आ जाती है। हल्दीघाटी की लड़ाई का वह ऐसा नायक है जो हार कर भी जीत गया और जीत कर अमर हो गया। उसका यश चारों और फैल गया। यों हल्दीघाटी की लड़ाई के साथ प्रताप का और प्रताप के साथ हल्दीघाटी का नाम जुड़ गया।
हल्दीघाटी दो किलोमीटर लम्बे उस संकडे पहाडी दर्रे का नाम है जो बलीचा गांव से नीचे खमणोर की ओर उतरता है। यह पहाडी मार्ग उस समय इतना संकड़ा था कि उसमें दो-तीन व्यक्ति एक साथ नहीं चल सकते थे इस घाटी की मिट्टी हल्दी के समान रंग वाली होने के कारण हल्दीघाटी के नाम से जानी जाती है।2 18 जून 1576 ई. के दिन अकबर के सेनापति मानसिंह व महाराणा प्रताप के बीच हुए इस युद्ध को अधिकाशं राजस्थानी स्रोतों और अबुलफजलकृत अकबरनामें में इसे 'खमणोर का युद्ध' बताया गया है। फिर यह 'हल्दीघाटी का युद्ध' कैसे प्रसिद्ध हुआ? इस प्रसंग में इतना ही कहा जा सकता है कि 'अमरकाव्य' का युद्ध क्षेत्र संबंधी विवरण ही इसका मूल आधार बना है।