International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN No. : XXXX – XXXX
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline : +91 – 8368 241 690
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Author(s): कु. नेहा असाटी
भारतीय साहित्य की परंपरा में लोकभाषाओं और बोलियों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यद्यपि लंबे समय तक साहित्यिक मान्यता मुख्यतः संस्कृत, फारसी, उर्दू और खड़ी बोली हिंदी तक सीमित रही, फिर भी क्षेत्रीय भाषाओं ने अपने लोकजीवन, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक यथार्थ के माध्यम से साहित्य को निरंतर समृद्ध किया। इन्हीं क्षेत्रीय भाषाओं में बुंदेली का स्थान विशिष्ट है। बुंदेलखंड की जीवन-शैली, संघर्ष, लोकमानस और सांस्कृतिक चेतना बुंदेली भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होती रही है।
ग़ज़ल एक ऐसी काव्य-विधा है, जिसकी उत्पत्ति अरबी-फारसी साहित्य में हुई और जिसने उर्दू साहित्य में अपने शिखर को प्राप्त किया। परंपरागत रूप से ग़ज़ल को प्रेम, विरह, दर्द, आध्यात्मिक अनुभूति और आत्मसंवाद की काव्य-विधा माना गया है। किंतु समय के साथ-साथ ग़ज़ल ने अपने विषय-क्षेत्र का विस्तार किया और सामाजिक, राजनीतिक तथा मानवीय प्रश्नों को भी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
भारतीय भाषाओं में ग़ज़ल का प्रवेश एक महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना है। हिंदी, गुजराती, मराठी, पंजाबी, बंगला आदि भाषाओं में ग़ज़ल लिखी गई, परंतु बुंदेली भाषा में ग़ज़ल का सृजन अपेक्षाकृत नवीन प्रयोग है। इस संदर्भ में महेश कटारे ‘सुगम’ का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें सर्वसम्मति से बुंदेली ग़ज़ल का जनक माना जाता है। उन्होंने पहली बार बुंदेली जैसी लोकभाषा में ग़ज़ल की शास्त्रीय संरचना को आत्मसात करते हुए उसे स्थानीय जीवन, सामाजिक यथार्थ और जनसंघर्ष से जोड़ा।
यह शोध-पत्र महेश कटारे ‘सुगम’ की बुंदेली ग़ज़लों का साहित्यिक, भाषिक और सामाजिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार सुगम जी ने परंपरागत उर्दू ग़ज़ल की सीमाओं से बाहर निकलकर बुंदेली ग़ज़ल को एक स्वतंत्र और प्रभावशाली काव्य-विधा के रूप में स्थापित किया।