International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डॉ० मिनाक्षी कोठारी, गिरीश पाठक
आधुनिक समय में परिवर्तित परिवेश में व्यक्ति अपने और अपने परिवार की देखभाल में इतना व्यस्त रहता है कि वह अपने शरीर पर ध्यान ही नहीं दे पा रहा है जिसके फलस्वरूप उसे इस युवावस्था में ही स्वास्थ्य सम्बन्धी कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। ऐसा परिवर्तित जीवनशैली, पारम्परिक खान-पान की आदतों में परिवर्तन और परिवर्तित सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के कारण होता है। इसलिए अधिकाँश व्यक्तियों को अनेकानेक स्वास्थ्य सम्बन्धी मानसिक विकारों से जूझना पड़ रहा है। जिसके कारण अत्यधिक बहुप्रचारित, बहुप्रचलित चिकित्सा पद्धतियाँ भी इस समस्या के निराकरण में विफल होती जा रही हैं। और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी मानसिक विकारों को रोकना एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इन विकारों के उपचार हेतु अत्यधिक संख्या में मानसिक दोशों से ग्रस्त व्यक्तियों को कई प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग करना पड़ रहा है। जिसके चलते प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर भी लोगों का ध्यान केन्द्रित हो रहा है। और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में रुचि भी उत्पन्न हो रही है। इसलिए, वर्तमान परिवेश में आयुर्वेद शास्त्र की ओर लोगों का बढ़ता रूझान यही सिद्ध कर रहा है कि प्राचीन चिकित्सा पद्धतियाँ आज भी उपयोगी ही नहीं अपितु अनुपम हैं।
आधुनिक समय में योग स्वास्थ्य के लिए जितना लाभप्रद है; उतना ही यौगिक क्रियाओं को करने से पूर्व शारीरिक एवं मानसिक रूप से शुद्धिकरण भी आवश्यक है। जिसके लिए शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों अथवा दोषों को बाहर निकालने के लिए योग की प्रथम अवस्था हठ यौगिक ग्रन्थों में वर्णित यौगिक षट्कर्म क्रिया है।
इन षट्कर्मों के अभ्यास से शरीर की शुद्धि होती है। षट्कर्म शारीरिक एवं मानसिक रूप से शरीर से दोषों का निर्हरण करते हैं तथा शारीरिक एवं मानसिक दोषों को साम्यावस्था में लाने का भी कार्य करते हैं। षट्कर्म अर्थात् ‘छः कर्म‘ हठयोग में बतायी गयी छः क्रियाऐं हैं। षटकर्म द्वारा सम्पूर्ण शरीर की शुद्धि होती है एवं देह निरोग रहता है।
उसी प्रकार आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ ‘जीवन का विज्ञान‘ है। आयुर्वेद स्वास्थ्य की एक ऐसी सम्पूर्ण चिकित्सा प्रणाली है, जिसका प्राचीन काल से ही पालन किया जा रहा है। आयुर्वेद के अनुसार - केवल बीमारियों से मुक्त होना ही स्वास्थ्य नहीं है; बल्कि यह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सन्तुलन की स्थिति है।
आयुर्वेद की अवधारणा है कि उपचार का मार्ग शरीर और मस्तिष्क में सन्तुलन स्थापित करता है और आयुर्वेदिक उपचार में व्यक्ति की जीवन-शैली तथा आहार-विहार की आदतों को बदलने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है; साथ ही साथ दोषों में सन्तुलन स्थापित करने के लिए शमन (शान्ति) या शोधन चिकित्सा (शुद्धिकरण) की जाती है।
पंचकर्म, आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित एक विशेष चिकित्सा पद्धति है; जो दोषों को शरीर से बाहर निकाल कर रोगों को जड़ से समाप्त करती है। यह शरीर शोधन की प्रक्रिया है, जो स्वस्थ मनुष्य के लिए भी लाभदायक है।