International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN No. : XXXX – XXXX
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline : +91 – 8368 241 690
Mail to Editor: [email protected]
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Author(s): डॉ. सुरेश्वर मेहेर
श्रीजगन्नाथ चेतना भारतीय दार्शनिक परंपरा की एक विशिष्ट और समन्वयात्मक अवधारणा है, जिसमें वेदांत, भक्ति, तंत्र तथा लोक परंपराओं का समावेश दिखाई देता है। यह चेतना ईश्वर को केवल संप्रदायगत या मूर्तिपूजक सीमा में नहीं बाँधती, बल्कि उसे ब्रह्म, ईश्वर और जीव के अभेद संबंध के रूप में प्रस्तुत करती है। दार्शनिक दृष्टि से श्रीजगन्नाथ चेतना अद्वैत और द्वैत के समन्वय का सशक्त उदाहरण है। उपनिषदों के निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा और भक्ति परंपरा के सगुण ईश्वर का भावात्मक स्वरूप, दोनों श्रीजगन्नाथ में एक साथ निहित हैं। विभिन्न भारतीय दार्शनिक संप्रदायों द्वारा प्रतिपादित जीव, जगत् और ब्रह्म विषयक तात्त्विक दर्शन इस चेतना में प्रतिफलित होते हैं । श्रीजगन्नाथ चेतना का सामाजिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है । रथयात्रा जैसी परंपराएँ सामाजिक समता, समरसता और मानवतावाद की भावना को सुदृढ़ करती हैं। यह चेतना लोक और शास्त्र, आध्यात्मिकता और सामाजिकता के बीच संतुलन स्थापित करती है। इसके अतिरिक्त, श्रीजगन्नाथ चेतना में सृष्टि, संरक्षण और लय की त्रिविध प्रक्रिया का दार्शनिक संकेत निहित है। श्रीजगन्नाथ चेतना न केवल धार्मिक आस्था का विषय है, बल्कि एक समग्र दार्शनिक दृष्टिकोण के रूप में भारतीय चिंतन परंपरा को गहराई और व्यापकता प्रदान करती है। प्रस्तुत लेख द्वारा श्रीजगन्नाथ चेतना के विविध दार्शनिक आयामों पर विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है ।