International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): प्रतिभा, डॉ रमेश कुमार
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य उपनिषद्-दृष्टि के आलोक में प्राण को चित्त-नियंत्रण एवं चित्त-शुद्धि का प्रमुख तत्त्व सिद्ध करना है। वैदिक एवं औपनिषदिक परम्परा में प्राण को केवल श्वास-प्रश्वास न मानकर उसे जीवन, चेतना और मानसिक संतुलन की आधारभूत शक्ति माना गया है। केन, कठ, प्रश्न, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों में प्राण को आत्मा का निकटतम कार्यकारी तत्त्व कहा गया है। योगदर्शन एवं हठयोग ग्रन्थों में प्राणायाम को चित्तवृत्तियों के निरोध का प्रमुख साधन माना गया है।
इस शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि प्राण का संतुलन ही चित्त की स्थिरता, शुद्धता एवं मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। आधुनिक मनोविज्ञान, न्यूरोसाइंस एवं साइकोफिज़ियोलॉजी भी आज श्वास-नियंत्रण को मानसिक संतुलन का प्रभावी साधन स्वीकार कर रही है। यह अध्ययन औपनिषदिक तत्त्वज्ञान, योगदर्शन एवं आधुनिक शोधों के समन्वय द्वारा यह प्रतिपादित करता है कि प्राण चिकित्सा न केवल साधना का माध्यम है, अपितु मानसिक रोगों की रोकथाम एवं व्यक्तित्व विकास का वैज्ञानिक उपाय भी है।