International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): Dr. Tanmay Mandal
भारतीय दर्शन में चेतना (Consciousness) को एक अत्यंत सूक्ष्म, गहन और मूल तत्व के रूप में देखा गया है, जो केवल मानसिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि अस्तित्व की आधारभूत सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित है। वेदों, उपनिषदों, सांख्य, योग, वेदांत तथा बौद्ध और जैन दर्शनों में चेतना के विभिन्न स्वरूपों और स्तरों का विश्लेषण मिलता है। उपनिषदों में "चैतन्य" को ब्रह्म के रूप में स्वीकारा गया है — वह जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और शुद्ध है। सांख्य दर्शन में पुरुष को निष्क्रिय, किन्तु शुद्ध चेतन सत्ता माना गया है, जबकि प्रकृति जड़ है। योग दर्शन चेतना की शुद्धि एवं आत्म-साक्षात्कार की ओर उन्मुख है। अद्वैत वेदांत में चेतना को "अहं" और "संसार" दोनों के पार की सत्ता, ब्रह्म रूप में देखा गया है, जो कि अद्वितीय और निर्गुण है।
यह लेख भारतीय दर्शन के विभिन्न प्रमुख विचार धाराओं में चेतना की अवधारणा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है, साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि भारतीय दृष्टिकोण में चेतना न केवल ज्ञान का माध्यम है, बल्कि वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है। आधुनिक विज्ञान और पाश्चात्य दार्शनिक विचारों की तुलना में, भारतीय दृष्टिकोण चेतना को केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सार्वभौमिक सत्ता के रूप में देखता है।
भारतीय दर्शन एक ऐसी समृद्ध परंपरा है, जिसमें जीवन, ब्रह्मांड और आत्मा के मूल तत्वों की गहन विवेचना की गई है। इनमें से चेतना (Consciousness) एक केंद्रीय अवधारणा है। चेतना को केवल मानसिक या जैविक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की मूल सत्ता के रूप में देखा गया है। भारतीय मनीषियों ने चेतना को न केवल आत्मा का लक्षण माना, बल्कि ब्रह्म की भी पहचान इससे की
है।
भारतीय दर्शन में चेतना को जीवन, आत्मा और ब्रह्म की अनुभूति का मूल स्रोत माना गया है। विभिन्न दार्शनिक परंपराओं — विशेष रूप से उपनिषदों, सांख्य, योग, वेदांत, जैन और बौद्ध दर्शन — में चेतना के स्वरूप की गहन विवेचना की गई है।