International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): अखिलेश कुमार यादव, प्रो. भगवन्त सिंह
पारंपरिक योग भारतीय संस्कृति और दर्शन का एक अमूल्य उपहार है जिसकी जड़ें वेद, उपनिषद, गीता और पतंजलि योगसूत्र तक फैली हुई हैं। वर्तमान भौतिकवादी युग में जहाँ तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली और नैतिक पतन जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं वहीं पारंपरिक योग की आवश्यकता और भी प्रबल हो जाती है। यह केवल आसन या व्यायाम आदि का साधन नहीं है, बल्कि मन, शरीर और आत्मा के संतुलन का विज्ञान है।
वर्तमान में योग मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक उन्नति का प्रभावी माध्यम है। पारंपरिक योग व्यक्ति को आत्म-अनुशासन, संयम, धैर्य और करुणा जैसे गुणों से संपन्न करता है। इसके अभ्यास से जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं, रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और व्यक्ति तनावमुक्त होकर स्वस्थ और संतुलित जीवन जीता है। सामाजिक दृष्टि से भी पारंपरिक योग समरसता, सहयोग और भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करता है। वैश्विक स्तर पर यह शांति और संतुलन की ओर ले जाने वाला मार्ग है। इस प्रकार पारंपरिक योग आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था। आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए इसको जीवन का अभिन्न अंग बनाना आवश्यक है।