International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
Author(s): सौरभ शर्मा, डॉ. अम्बरीष राय
यम-नियम को महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के प्रथम दो सीढ़ियों के रूप में वर्णित किया है, जिस प्रकार भवन के निर्माण के लिये उसका आधार अर्थात् नींव को मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है उसी प्रकार अष्टांग योग की साधना में साधक हेतु यम-नियम आधारशिला है। वर्तमान काल में नैतिक मूल्यों का ह्रास, सामाजिक, मानसिक द्वन्द्वों से पीड़ित मानव जाति के उत्थान के लिये यम -नियम मार्गदर्शक और श्रेष्ठ मूल्यवान जीवन जीने व स्वयं के उत्थान एवं मानवजाति के कल्याण हेतु उपयोगी शिद्ध हो सकते हैं। यम-नियम न सिर्फ योगसाधक के लिये अपितु सर्व-सामान्य व्यक्ति के पालन हेतु महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं जैन धर्म में यम को पंचमहाव्रत की संज्ञा दी गई है।
यह शोध वर्तमान समय में समाज कल्याण हेतु यम-नियम की उपयोगिता, व्यावहारिकता एवं आवश्यकताओं का अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस शोध में विभिन्न रूप से असंतुष्ट, तनावग्रस्त व क्रोध एवं हीनभावना से ग्रस्त मानव जाति के कल्याण हेतु नैतिक मानसिक एवं भावनातमक संतुष्टि हेतु यम-नियम एक कल्याणकारी मार्ग प्रदर्शक के रूप में एवं मूल्यवान व सार्थक जीवन बनाने हेतु आवश्यकता पर जोर दिया गया है