International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): प्रो. राजू बागलकोट
समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में गीतांजलि श्री का नाम उन रचनाकारों में प्रमुखता से लिया जाता है जिन्होंने भारतीय समाज, स्त्री-अस्तित्व, सांस्कृतिक स्मृतियों और बदलते सामाजिक यथार्थ को नवीन शिल्प एवं संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया है। उनके उपन्यास केवल घटनाओं का आख्यान नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य के अस्तित्व, स्मृति, इतिहास, भाषा और संस्कृति के गहन अंतःसंबंधों का रचनात्मक अन्वेषण प्रस्तुत करते हैं। गीतांजलि श्री की रचनात्मक दृष्टि स्त्री-विमर्श को केवल अधिकारों की मांग तक सीमित नहीं रखती, बल्कि वह स्त्री की आत्मचेतना, उसकी वैचारिक स्वतंत्रता और उसकी सांस्कृतिक भूमिका को व्यापक सामाजिक संदर्भों में समझने का प्रयास करती है। उनके उपन्यासों में स्त्री, समाज और संस्कृति एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए विमर्श हैं, जो आधुनिक भारतीय जीवन की जटिलताओं को उद्घाटित करते हैं। प्रस्तुत आलेख में गीतांजलि श्री के प्रमुख उपन्यासों के आधार पर समकालीन स्त्री-विमर्श, सामाजिक यथार्थ तथा सांस्कृतिक चेतना का विश्लेषण किया गया है।