International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डॉ.मनीषा सिंह
संस्कृत वाङ्मय के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पर्यावरण एक सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक विषय है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों, मुनियों, कवियों आदि ने अपनी रचनाओं में पर्यावरण एवं पर्यावरण-संरक्षण को विशेष महत्त्व दिया है । इसी प्रसंग में महाकवि कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम् उल्लेखनीय है । प्रस्तुत शोधपत्र में अभिज्ञानशाकुन्तलम् में महाकवि द्वारा प्रतिपादित पर्यावरण एवं पर्यावरण-संरक्षण सम्बन्धी विचारों का विशेष रूप से विवेचन किया गया है जो वर्तमान काल में भी प्रासंगिक सिद्ध होता है ।
महाकवि कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृत-साहित्य की ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व साहित्य की अनुपम कृति है, जो सम्पूर्ण मानव-जीवन का आदर्श प्रस्तुत करती हुई भारतीय लोक-जीवन में विशेष महत्त्व रखती है । विद्वानों ने मुक्त कण्ठ से कालिदास को प्रकृति का सूक्ष्म द्रष्टा स्वीकार किया है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् में स्थान-स्थान पर महाकवि की पर्यावरण एवं पर्यावरण-संरक्षण सम्बन्धी अलौकिक चेतना के दर्शन होते हैं । परि का अर्थ है सब ओर, चारों ओर, इधर-उधर, इर्द-गिर्द, घिरा हुआ आदि। वृङ् धातु आवृत्त या आच्छादित करने के अर्थ में प्रयोग की जाती है । अतः पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है- परितः आवृणोति आच्छादयति यत् तत् पर्यावरणम् अर्थात् जीवों को चारों ओर से घेरने वाला आवरण ही पर्यावरण है । इस प्रकार पर्यावरण का तात्पर्य हमारे चारों ओर के उस आवरण एवं परिवेश से है जिससे हम घिरे रहते हैं और जो प्रत्यक्ष एवम् अप्रत्यक्ष रूप से हमें प्रभावित करता है । पर्यावरण को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है- प्राकृतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण । प्राकृतिक पर्यावरण से तात्पर्य उस पर्यावरण से है जो पूर्णतः प्रकृति प्रदत्त है जैसे वायु, जल, भूमि, वन एवं वन्य सम्पदा, पशु-पक्षी, मानव आदि। सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिस्थितियाँ तथा सांस्कृतिक प्रतिमान जैसे- धर्म, कर्म, परम्पराएँ आदि सभी सम्मिलित हैं । इसी आधार पर पर्यावरण संरक्षण को भी दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण संरक्षण ।