भारतीय शाब्दबोध परम्परा में आकाङ्क्षा

Author(s): प्रो. मधुबाला सिंह

Abstract:

शाब्दबोध की प्रक्रिया में शाब्दबोध के प्रति करण (पदज्ञान) का जितना महत्त्व है उतना ही शाब्दबोध के सहकारी कारणों का है। वाक्यस्थ पदों में योग्यता, आकाङ्क्षा, आसत्ति और तात्पर्य इन चारों का ज्ञान शाब्दबोध के प्रति सहकारी कारण के रूप में आवश्यक होता है। वाक्य में आसत्ति के माध्यम से पद परस्पर अन्वय हेतु निकट हो जाते हैं। अनन्तर वाक्य में एक पद जब अन्य पद के बिना अर्थ का बोध न करा पाये, तब वाक्यार्थ बोध हेतु एक पद को अपर पद की अपेक्षा होती है, यह अपेक्षा ही दर्शन में आकाङ्क्षा कहलाती है। इस प्रकार आकाङ्क्षा एक विशेष प्रकार की अपेक्षा है जो वाक्य के घटक पदों में परस्पर होती है। वाक्य के ये घटक पद कारक पद तथा क्रिया पद होते हैं, इसलिए क्रिया पद तथा कारक पदों में परस्पर अपेक्षा होती है। इस प्रकार शाब्दबोध के प्रति आकाङ्क्षा की सहकारी कारणता अनिवार्य रूप से व्याख्यायित है।

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