कृष्णयजुर्वेदीय मैत्रायणी शाखा के श्रौतसूत्रों में वर्णित अग्निहोत्र का वैज्ञानिक विश्लेषण

Author(s): विमलेश कुमार राय, डॉ॰ चूड़ामणि त्रिवेदी

Abstract:

प्रस्तुत शोध पत्र कृष्णयजुर्वेदीय मैत्रायणी शाखा के श्रौतसूत्रों में वर्णित 'अग्निहोत्र' का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करता है। अग्निहोत्र केवल धार्मिक कर्मकांड न होकर एक जटिल 'जैव-भौतिकीय' प्रक्रिया है। मैत्रायणी शाखा की विशिष्टता इसकी उच्चारण विधि और आहुति के विधान में निहित है। यह शोध प्रमाणित करता है कि अग्निहोत्र के माध्यम से वायुमंडल के गैसीय घटकों में परिवर्तन, आयनीकरण और सूक्ष्म तरंगों का सृजन होता है जो मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य हैं। मैत्रायणी शाखा कृष्णयजुर्वेद की एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण शाखा है। इसके श्रौतसूत्रों में यज्ञीय विज्ञान को बहुत सूक्ष्मता से परिभाषित किया गया है। अग्निहोत्र को 'नित्य यज्ञ' कहा गया है, जिसका अर्थ है—वह प्रक्रिया जो ब्रह्मांड की निरंतरता को बनाए रखती है। आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से, हमारा सौरमंडल एक निश्चित लय पर कार्य करता है। मैत्रायणी ऋषियों ने सूर्योदय और सूर्यास्त के उस सटीक क्षण को पहचाना जब प्रकृति में ऊर्जा का भारी रूपांतरण होता है। इसी रूपांतरण का लाभ उठाने के लिए अग्निहोत्र का विधान किया गया।

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