Author(s): विक्रम सिंह कण्डारी, डॉ. रूपाली गुप्ता
Abstract:
योग परम्परा में "नाड़ी" की अवधारणा सूक्ष्म शरीर की सबसे महत्वपूर्ण संरचना मानी जाती है। विभिन्न योगोपनिषदों एवं संहिताओं में नाड़ियों का वर्णन भिन्न–भिन्न रूपों में मिलता है। नाड़ियाँ केवल शारीरिक नसें नहीं हैं, बल्कि वे ऊर्जा वाहिनी मार्ग हैं, जिनसे प्राणशक्ति का संचार समूचे शरीर में होता है। योगोपनिषदों और हठयोग ग्रंथों में नाड़ियों की संख्या, नाम तथा उनके साधना संबंधी महत्व का गहन विवेचन मिलता है। प्रस्तुत शोध–लेख का उद्देश्य गोरख संहिता और वशिष्ठ संहिता में नाड़ियों के वर्णन का तुलनात्मक अध्ययन करना है। गोरक्ष संहिता, नाथ–योग परम्परा का प्रतिनिधि ग्रंथ, मुख्यतः हठयोगिक साधना पर आधारित है। इसमें नाड़ियों की संख्या 72,000 मानी गई है, जिनमें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना को साधना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। नाड़ियों के शुद्धिकरण और सुषुम्ना के सक्रियण को कुण्डलिनी जागरण तथा योग सिद्धि का आधार बताया गया है। दूसरी ओर, वशिष्ठ संहिता नाड़ियों को अधिक दार्शनिक और ध्यान–प्रधान रूप से प्रस्तुत करती है। इसमें भी 72,000 नाड़ियों का उल्लेख मिलता है, सभी नाड़ियों का उद्गम "कंद" ही बताया गया है। वशिष्ठ संहिता में नाड़ियों का उद्देश्य साधक को "हृदय–आकाश" में स्थित परमब्रह्म के बोध की ओर ले जाना है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के साथ अन्य गौण नाड़ियों जैसे गांधारी, पूषा, अलम्बुषा आदि का भी वर्णन किया गया है। यद्यपि गोरख संहिता और वशिष्ठ संहिता की दृष्टि और शैली में अंतर हैगोरख संहिता व्यावहारिक और हठयोगिक है जबकि वशिष्ठ संहिता दार्शनिक और ध्यान–प्रधान है फिर भी दोनों में नाड़ियों को साधना का आधार माना गया है। नाड़ियों का शुद्धिकरण, प्राणायाम की प्रक्रिया तथा साधक को आत्म–साक्षात्कार की ओर ले जाने में उनका महत्व समान रूप से स्वीकार किया गया है। गोरख संहिता और वशिष्ठ संहिता, दोनों ही ग्रंथ यौगिक नाड़ी तंत्र की समझ को समृद्ध करते हैं तथा साधक को क्रमशः व्यावहारिक साधना और दार्शनिक चिंतन की दोनों दिशाओं में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
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