Author(s): राहुल अहिरवार, डॉ.अजय कुमार चौधरी
Abstract:
प्रस्तुत शोध आलेख समकालीन हिंदी कहानियों में पंकज सुबीर की कहानियों में बाजारवाद के बदलते स्वरूप को प्रस्तुत करता है । आज किस प्रकार से वर्तमान मे हिंदी कथा साहित्य जगत में प्रगति हो रही है,कहा जाता है “सहित्य समाज का दर्पण होता है। ” जिस प्रकार से समाज बदलता है,साहित्य भी उसी तरह बदलता जा रहा है,आज का समय भूमंडलीकरण का समय है,जिसे वैश्वीकरण,बाजारीकरण आदि के नाम से भी जाना जाता है । आज कविता, कहानी,उपन्यास, नाटक, आलोचना जन -संचार माध्यमों पर बाजारवाद का व्यापक प्रभाव है भूमंडलीकरण, सूचना एवं संचार की क्रांति ने बाजारवाद का बहुत पोषण किया है । इसमें मनुष्यता के समक्ष नए-नए संकट उत्पन्न हो गए हैं,बाजारवाद 21वीं सदी के वैश्वीकरण की एक विश्व -स्तरीय व्यापार नीति है । जिसमें आज समाज का हर वर्ग आगे भी बढ़ रहा है और परेशान भी है। आज बाजारवाद अपने चरम सीमा पर पहुंच चुका है। इस शोध में पंकज सुबीर की कहानियों के कुछ अंशो को लिया गया है । जिसमें बाजारवाद के बदलते स्वरूप को दिखाया गया है । किस प्रकार से एक आम नागरिक इस बाजारवाद से में फंसकर अपने आप को अकेला, ठगा हुआ महसूस करने लगता है ।
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