भारतीय षड्दर्शन में चेतन एवं अचेतन (प्रकृति) का अध्ययन

Author(s): डॉ० रेणु सिंह

Abstract:

भारतीय दर्शन विश्व की प्राचीनतम दार्शनिक परंपराओं में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल तर्क-वितर्क नहीं, बल्कि मनुष्य को सही जीवन जीने की राह दिखाना और आत्मा को परमात्मा से मिलाने की साधना करना है। ‘दर्शन’ शब्द का अर्थ है- सत्य को देखना या जानना। भारतीय दर्शन केवल तर्क और विचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला और आत्मा की मुक्ति का मार्ग भी बताता है। भारतीय छह दर्शनों (सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत) में चेतन और अचेतन तत्व का वर्णन किया गया है। वेद में जगत् के मूल में तीन तत्व माने गये हैं- ईश्वर, जीव एवं प्रकृति। ऋग्वेद में इन्हीं तीन मूल तत्त्वों की ओर इंगित किया गया है। इसमें कहा गया है कि आत्मा और परमात्मा रूपी दो पक्षी अपने समान भाव से एक ही वृक्ष (प्रकृति) पर बैठे हुए हैं। उनमें से एक जीवात्मा इस प्रकृति रूपी वृक्ष के फलों को खाता है (भोगता है) तथा परमात्मा साक्षी रूप से देखता है। इसी प्रकार ‘‘यस्मिन वृक्षे मध्वदः सुपर्णा’’ से भी यही ध्वनि निकलती है कि प्रकृति रूपी वृक्ष पर बैठे जीव अपने पाप-पुण्य रूपी कर्मों के फलों का भोग करते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में इन तीन तत्त्वों की प्रक्रिया को और भी स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है कि यह तीन प्रकाशमय पदार्थ-ईश्वर, जीव तथा प्रकृति नियमानुसार विविध कार्य कर रहे हैं।

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