Author(s): दीप्ति डिगल
Abstract:
मध्यकालीन समय में हिन्दू, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी, ईसाई आदि धर्म प्रमुख थे। जनसाधारण के विश्वास की ईंट से धर्म का यह भवन तैयार हुआ था। लोक धर्म की निष्ठा और उसका धर्माचार परंपरागत और चमत्कार से प्रभावित था। ध्यान यदि आदिवासियों पर आकृष्ट करें तो उनका धर्म सीमित था, केवल उन्हीं तक। यही कारण है कि उन दिनों हिन्दू और इस्लाम यह दो ही प्रधान धर्म थे। जैन धर्म का प्रचार पश्चिम दक्षिण के क्षेत्र में अधिक था, वहीं बौद्ध धर्म पूर्वी प्रांतों में फैला हुआ था। इस्लाम धर्म के संपर्क में आकर हिन्दू धर्म व्यक्तिगत साधना के केंद्र से उभर कर सामूहिक साधना का रूप धारण करने लगा। इसमें आंदोलनकारी प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगीं। इसी कारण सभी धर्मों में युगों के अनुरूप तथा स्थिति के अनुसार पंथों, संप्रदायों, उपसंप्रदायों की सृष्टि होने लगी। इन सभी का मुख्य उद्देश्य आत्म निरीक्षण और परिस्थिति का परीक्षण कर सुधार लाना था। ऐसा करने का कारण था परंपरागत आचार विचार को किसी न किसी रूप में जीवित रखना।
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