श्रीमद्भागवत महापुराण में भक्ति प्रमुख आधार

Author(s): मीनाक्षी कोठारी, डॉ. रामभूषण बिजल्वाण

Abstract:

श्रीमद्भागवत महापुराण भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति का एक अनुपम ग्रंथ है, यह न केवल अध्यात्मिक विकास का पथप्रदर्शक है बल्कि लौकिक जीवन को भी शुद्ध सुसंस्कृत और संतुलित बनाने में सहायक है। इस ग्रंथ का मूल आधार भक्ति है, भगवद् प्राप्ति का सर्वात्तम मार्ग श्रीमद्भागवत महापुराण में भक्ति को बताया गया है जो मनुष्य को आत्म साक्षात्कार और मोक्ष की ओर ले जाता है, भागवत महापुराण के अनुसार भक्ति का आरंभ उस समय होता है जब मनुष्य के भीतर आस्तिकता का भाव जागृत होता है और वह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर उनसे जुड़ने की लालसा रखता है। जब परमात्मा की कृपा होती है तभी जीव के हृदय में भक्ति का अंकुर फूटता है, यह भक्ति ज्ञान, योग और तप जैसे साधनों से ऊपर मानी गई है क्योंकि इसमें प्रेम की प्रधानता होती है, जो सीधा ईश्वर से जोड़ती है। पादसेवन भक्ति की आदर्श आचार्या लक्ष्मी जी मानी जाती हैं जो निरंतर भगवान श्री नारायण के चरणों की सेवा में लीन रहती हैं, इस भक्ति में आराध्य के चरणों को अपने जीवन का आधार मानकर उन्हें ही सर्वस्व समझते हुए पूर्ण समर्पण के साथ सेवा करना ही पादसेवन है।

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