संस्कृत नीति-साहित्य की शैक्षिक दृष्टि का समकालीन पुनर्पाठ

Author(s): डॉ० विष्वक्सेन दत्त द्विवेदी

Abstract:

संस्कृत नीति-साहित्य में शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन न मानकर व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास की समन्वित प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, चाणक्यनीति तथा नीतिशतक आदि ग्रन्थों में विद्या को विनय, विवेक, आत्मनियमन, शील और लोकमंगल से सम्बद्ध किया गया है। इन ग्रन्थों की कथा, संवाद तथा नीतिसूक्ति-प्रधान शिक्षण-पद्धति ज्ञान को जीवनानुभव से जोड़ती है। वर्तमान सूचना-प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में नीति-साहित्य का पुनर्पाठ इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि वह शिक्षा को सूचना-संचय से आगे ले जाकर विवेकपूर्ण निर्णय, नैतिक स्वायत्तता और सामाजिक उत्तरदायित्व से सम्बद्ध करता है। प्रस्तुत अध्ययन नीति-साहित्य में अन्तर्निहित शैक्षिक दृष्टि का विश्लेषण करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता-प्रधान समकालीन परिवेश के संदर्भ में उसकी पुनर्व्याख्या करता है और एक समन्वित समकालीन शैक्षिक प्रतिमान प्रस्तावित करता है।

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