Author(s): Ruchika Upadhyay
Abstract:
आदियुग से वर्तमान समय तक इस धरती पर मनुष्य ने राष्ट्र, नगर, ग्राम, बस्तियां, महल, दुर्ग, प्रासाद एवं सामान्य प्रकार के गृह-निर्माण से लेकर बहुमंजिली इमारत का अपने रहन-सहन तथा उपयोग के लिए निर्माण किया है। वैदिक चिन्तनधारा में एक ही ऐसी विद्या है, जिसमें मनुष्यमात्र के लिए आवास एवं अन्य कार्यों के लिए निर्मित भवनों में पञ्चमहाभूतों के सन्तुलन का ध्यान रखकर भवन निर्माण के नियमों का वर्णन एवं विवेचन किया गया है, जिससे उसकी शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं को सक्रिय कर सही दिशा प्रदान करी जा सके। इस विद्या को स्थापत्य अथवा वास्तुशास्त्र के नाम से जाना जाता है। देवताओं के वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा, जो कि ब्रह्माजी के ही मानस-पुत्र थे, वैदिक युग से ही भवन-निर्माण और वास्तुकला के सर्वोच्च विद्वान रहे हैं।
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