Author(s): कुलभूषण शारदा
Abstract:
संस्कृत साहित्य भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की अमूल्य धरोहर है, जिसमें काव्य की विविध विधाओं का सशक्त विकास हुआ है। इसी क्रम में काव्य रचना में ‘सन्धान-काव्य’ का विशिष्ट स्थान है। धनञ्जयकृत ‘द्विसन्धान महाकाव्य’ को इस परम्परा की अक्षभूत कृति माना जाता है। कविवर धनञ्जय ने अपनी रचना में दो भिन्न कथाओं का ऐसा अद्भुत मिश्रण किया है कि पाठक दोनों कथाओं रामायण और महाभारत का रसास्वादन एक साथ कर सकता है। द्विसन्धान महाकाव्य का सूक्ष्मता से अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि अनुपम इस महाकाव्य में लोक प्रकाश की ऐसी शिक्षा विद्यमान है जो पग-पग पर मानव मार्ग को प्रशस्त करती है। ये शिक्षाएं मानव मात्र के कल्याण के लिए बहुत उपयोगी है यह लोक मंगल उपदेश तत्कालीन समय के साथ-साथ आधुनिक समय में भी मानव मात्र को जीवन जीने की कला सिखाने के साथ-साथ सार्थक जीवन की महत्ता पर भी प्रकाश डालते हैं। धनञ्जय ने अपने काव्य में भारतीय समाज, संस्कृति, धर्म और नैतिक मूल्यों का सुंदर चित्रण किया है। उनकी रचना में जीवन के विविध पक्षों जैसे धर्म-अधर्म, वीरता-करुणा, नीति-अनीति, मन, वचन, कर्म, ज्ञान, विवेक, सत्याचर, धर्मपालन इत्यादि का सन्धान मिलता है, जिससे यह काव्य रत्नों से परिपूर्ण समुद्रवत भाषित होता है। कतिपय अधोलिखित लोकमंगलपरक उपदेशों का विवरण दिया जा रहा है। समाज की अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए द्विसंधानमहाकाव्य में जो शाश्वत उपदेश वर्णित हैं उनकी समीक्षा करना ही प्रस्तुत शोध-पत्र का मुख्य उद्देश्य है।
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