Author(s): प्रोफ़ेसर आशा रानी पाण्डेय
Abstract:
आधुनिक सभ्यता के तीव्र संक्रमण, अत्यधिक तकनीकी प्रभुत्व और तीव्र सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों के इस दौर में युवाओं (विशेष रूप से १३ से १७ वर्ष के किशोरों) में मानसिक अवसाद (Clinical Depression) एक गंभीर वैश्विक महामारी के रूप में उभरा है। वर्तमान युवा पीढ़ी तीव्र अकादमिक दबाव, अवास्तविक सामाजिक अपेक्षाओं, एकाकीपन, पारिवारिक कलह और अस्तित्वगत शून्यता के कारण अत्यंत जटिल मानसिक द्वंद्वों का सामना कर रही है। इस संदर्भ में, प्राचीन भारतीय दार्शनिक ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' केवल एक आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान का एक कालजयी और गहन नैदानिक प्रलेख है। गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन का मानसिक पतन आधुनिक युग के गंभीर अवसाद और नैदानिक चिंता (Clinical Anxiety) का सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अठारह अध्यायों में प्रतिपादित समाधान वस्तुतः एक व्यवस्थित मनोचिकित्सीय हस्तक्षेप (Psychotherapeutic Intervention) है, जो आधुनिक संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT), अस्तित्वगत चिकित्सा (Existential Therapy) और मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) के सिद्धांतों को सहस्राब्दियों पूर्व ही समाहित किए हुए था।
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