भारतीय ज्ञान परंपरा में आस्तिक दर्शन के प्रमाणों का विवेचन

Author(s): प्रो हीरालाल शर्मा, डा रीता यादव, डाँ राजेन्द्र कुमार वर्मा

Abstract:

“प्रमाण के अभाव में किसी भी वस्तु का यथार्थ ज्ञान संभव नहीं है इसलिए समस्त शास्त्रों में प्रमाण को प्राणतुल्य महत्व प्रदान किया गया है।” सृष्टि के आदि काल से ही प्रमाण का महत्व मानव जीवन में विद्यमान रहा है । जब कोई जीव इस संसार में जन्म ग्रहण करता है, तभी से वह अपने आसपास की वस्तुओं का प्रत्यक्ष अनुभव करने लगता है । इस प्रकार जन्म के साथ ही प्रमाण की आवश्यकता और उपयोगिता का आरम्भ हो जाता है । वस्तुतः इस चराचर जगत् के समस्त दृश्य-अदृश्य, स्थूल-सूक्ष्म, ज्ञेय-अज्ञेय तथा भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बद्ध समस्त तत्त्वों का ज्ञान प्रमाणों के माध्यम से ही प्राप्त होता है। ईश्वर, जीव, प्रकृति, धर्म-अधर्म, विद्या-अविद्या, बन्धन-मोक्ष, नित्य-अनित्य, न्याय-अन्याय, वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था जैसे गूढ़ विषयों की सही समझ भी प्रमाणों पर ही आधारित है । ज्ञान, विज्ञान, कला, शास्त्र और व्यवहार-सभी का मूलाधार प्रमाण ही है। इसी कारण राग, द्वेष और मोह से रहित, लोककल्याण के लिए समर्पित ऋषियों ने प्रतिपादित किया है कि वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप का निर्णय उनके लक्षणों और प्रमाणों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। अर्थात् किसी भी विषय की सत्यता को जानने के लिए प्रमाण का सहारा लेना अनिवार्य है । वर्तमान युग में पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण वेदों और अन्य सत्यशास्त्रों में निहित दिव्य ज्ञान की उपेक्षा होती दिखाई दे रही है । भारतीय ऋषियों और मनीषियों की अमूल्य वाणी भी अनेक स्तरों पर विस्मृत की जा रही है । ऐसे समय में महान दार्शनिक महर्षि वात्स्यायन का यह कथन अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है कि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के आधार पर वस्तुओं का परीक्षण और सत्यापन करना ही न्याय है । न्याय दर्शन में प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता और प्रमिति के परस्पर सम्बन्ध का अत्यन्त सूक्ष्म एवं गम्भीर विवेचन किया गया है, जो मानव को संकीर्णता, दुर्बलता और अज्ञान से ऊपर उठाकर उदारता, श्रेष्ठता तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है । इस सन्दर्भ में वेद, दर्शन तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का विशेष महत्व है। ये ग्रन्थ पतित और अज्ञानग्रस्त मनुष्यों को देवत्व तथा अमरत्व की दिशा में प्रेरित करते हैं । चूँकि इनमें ईश्वर की सत्ता, उसकी प्राप्ति के साधन तथा मानव जीवन के परम लक्ष्य का निरूपण किया गया है, इसलिए इन्हें आस्तिक ग्रन्थ कहा जाता है ।

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