Author(s): हेमलता त्रिवेदी, प्रो. मीना गुप्ता
Abstract:
अर्थात हे गंगा मैया! मैं आपके चरण कमल की वंदना करती हूं जिन दिव्य चरणों को देव दानव सभी पूजते है।आप सदा ही मनुष्यों को उनके भावनानुसार ऐहिक सुखभोग तथा पारलौकिक मोक्ष प्रदान करती है। भारतीय मनीषियों की विचारधारा में भगवती गंगा के प्रति राष्ट्र एवं समाज के हृदय स्थल में इतनी गहरी आस्था ज्ञात होती है। एक ओर अनेक धाराओं का संगम भारतीय एकता को पुष्ट करता है तो दूसरी ओर इस त्रिवेणी तट पर अनेक भारतीय संस्कृतियों का संगम राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता का संवाहक है। मानव कर्मयोग में लगे, भक्ति की धारा से स्नान, ज्ञान मार्ग का अवलंबन करने वाले विद्वत जन, सिद्धयोगी और मुनि त्रिवेणी के तट पर धर्म का उपदेश देते हैं। जैसा कि सभी विद्वतजन को अवगत हैं कि स्वर्धुनि निरंतर कारखानों से निकलने वाले कूड़े-कचरे से भरे हुए धन से पूर्ण किन्तु शोभाहीन कर्णपुर (कानपुर शहर) को देखकर बड़ा दुरूख होता है। किसी से अपनी पीड़ा कहने में असमर्थ गंगा अपने ही पुत्रों के पापों को ढोती हुई बड़ी लज्जित एवं दुरूखी है। रासायनिक द्रवों से व्याकुल होकर एवं चमड़े के गंध के प्रदूषण से तथा जानलेवा होकर मानों अपने हृदय की मार्मिक वेदना को तीर्थराज प्रयाग से कहने के लिए वह आगे चल पड़ती है।
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