तुलसीदास की काव्य-दृष्टि और सांस्कृतिक समन्वय : आलोचकीय स्थापनाओं का पुनर्मूल्यांकन

Author(s): डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी

Abstract:

गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य की भक्तिकालीन परंपरा के ऐसे महत्त्वपूर्ण कवि हैं जिनके कृतित्व में भक्ति, लोकजीवन, सामाजिक चेतना, नैतिकता, सौंदर्यबोध, भाषा और सांस्कृतिक परंपरा के विविध आयाम परस्पर संबद्ध दिखाई देते हैं। तुलसी का साहित्य केवल आध्यात्मिक अनुभूति का काव्य नहीं है; उसमें तत्कालीन सामाजिक जीवन, मानवीय संबंधों, नैतिक मूल्यों, लोकमंगल और सांस्कृतिक चेतना के अनेक स्तर अभिव्यक्त हुए हैं। प्रस्तुत शोध-आलेख में रामविलास शर्मा, रामचन्द्र तिवारी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, उदयभानु सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, बलदेव प्रसाद मिश्र, रमेश कुंतल मेघ, विष्णुकांत शास्त्री तथा प्रो. बारान्निकोव आदि आलोचकों की स्थापनाओं के आधार पर तुलसी के काव्य का अध्ययन किया गया है। आलोचकीय विचारों के माध्यम से तुलसी की काव्य-दृष्टि, सामाजिक दृष्टि, भक्ति-भावना, सौंदर्यबोध, प्रकृति-चित्रण, भाषा-शैली, युगबोध और सांस्कृतिक भूमिका के विभिन्न पक्ष सामने आते हैं। तुलसी के साहित्य में ‘उचित का ग्रहण और अनुचित का त्याग’, मन-वचन की सरलता, सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिक सौंदर्य, हृदय और विवेक का संतुलन, लोक और शास्त्र का संवाद तथा समन्वयात्मक दृष्टि प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरती हैं। तुलसी की भक्ति में सामाजिक समता और इतरजनों के प्रति संवेदनशीलता का प्रश्न भी है। आलोचकीय पुनर्पाठ से तुलसी का साहित्य लोकमंगल, जीवन-विवेक और सांस्कृतिक समन्वय की व्यापक चेतना का साहित्य सिद्ध होता है।

PDF URL: View Article in PDF