International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डा. सुषमा जोशी , डॉ. प्रदीप कुमार
भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक मानी जाती है, जिसकी सामाजिक संरचना विविध रूपों में विकसित हुई। इन सामाजिक संरचनाओं में वर्ण व्यवस्था एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली संस्था रही है। इसका मूल उद्देश्य समाज को एक सुव्यवस्थित ढांचे में बाँटना था, जिससे प्रत्येक व्यक्ति के कार्य, कर्तव्य और उत्तरदायित्व निर्धारित हों। श्रीमद्भागवत के अनुसार ब्रह्म के अवलोकन की क्षमता मानव में है। परब्रह्म के साक्षात्कार का अर्थ है- स्वात्मदर्शन, वर्ण धर्म एवं आश्रम धर्म इसकी प्रधान भित्तियां हैं। जहाँ वर्ण-धर्म और आश्रम धर्म नही है। वहां आत्मसाक्षात्कार रूप मानव लक्ष्य की पूर्ति की सम्भावना ही नहीं की जा सकती है। सत्य, चोरी न करना, अक्रोध, पवित्रता, बुद्धि, मनःसंयम, इन्द्रिसंयम विद्या आदि सार्वभौम धर्म है। इन धर्मों के पालन किये बिना मानव लक्ष्य सिद्धि पर नहीं पहुँच सकता। जिन देशों में तथा जिन वर्गों में वर्णाश्रम-व्यवस्था नहीं है, वहाँ आध्यात्मिक सुख स्वप्न में भी प्राप्त नहीं हो सकता-यह ध्रुव सत्य है। वर्णाश्रम व्यवस्था यदि स्थिर होती तो आज भी समाज की सर्वांगीण उन्नति होती देख पड़ती, इसलिये वर्ण व्यवस्था का बंधन मानव के लिये व्यक्ति और समाज के लिये आवश्यक था, आज भी है। मानव की स्वैर मनः सरिता को सुनियन्त्रित रखने के लिये यदि वर्णाश्रम व्यवस्था का बांध बांधा जाता तो आध्यात्मिक और नैतिक कृषि के लिये भरपूर जल मिलता, उससे उपज भी बढ़ सकती। थी। उसके अभाव में जहाँ उसकी आवश्यकता नहीं, वहां उसकी बहुलता हो गयी। इससे दुर्गुणों के खाल खड्डों में से होकर यह नदी बहती रहेगी और कुविचारों का जंगल ही उससे बढ़ता रहेगा। वर्णाश्रम संस्था से ही मानवता का पोषण और संरक्षण उत्तम रीति से हो सकता है, यही अपने समाज का सत्यानुभव है। वर्ण व्यवस्था का मूल स्वरूप सामाजिक कार्यों के सुव्यवस्थित संचालन हेतु था, लेकिन समय के साथ इसमें विकृति आ गई और यह सामाजिक असमानता का कारण बन गई। आज के लोकतांत्रिक और आधुनिक समाज में व्यक्ति की पहचान उसके गुण, शिक्षा और कर्म से होनी चाहिए, न कि जन्म से। हमें अपने समाज में समानता, सहिष्णुता और समरसता की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।