International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN No. : XXXX – XXXX
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline : +91 – 8368 241 690
Mail to Editor: [email protected]
ISSN No. : XXXX – XXXX
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline : +91 – 8368 241 690
Mail to Editor: [email protected]
Author(s): जयवीर सिंह राजौरिया, डॉ.सुदामा सिंह यादव
प्रागैतिहासिक काल से भारत विभिन्न जातियों और संस्कृतियों की आश्रयस्थली रहा है, और उनकी जीवन विधाओं के संघर्ष और समन्वय द्वारा भारतीय इतिहास की प्रगति और संस्कृति का विकास हुआ है । भारत में दर्शन की एक लम्बी परम्परा है। यहाँ धर्म और दर्शन का गहरा संबंध हमेशा से रहा है। दर्शनों की संख्या ९ बताई गयी है,जिनमे ६ आस्तिक और ३ नास्तिक है, योगदर्शन आस्तिक दर्शनों की श्रंखला में आता है। योगदर्शन के अष्टांगयोग से समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों का अंत किया जा सकता है ,अष्टांग योग का मुख्य उद्देश्य समाधि की प्राप्ति है,जिसे अष्टांग योग के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अष्टांग योग के द्वारा महर्षि पतंजलि मोक्ष प्राप्ति को महत्वपूर्ण माना था, जिसके लिए उन्होंने योग के आठ अंगों की कल्पना की और मोक्ष प्राप्ति हेतु इनका पालन आवश्यक है। योग दर्शन इसे आठ अंगों के रूप में जाते है, जो हमें यथार्थ के सही स्वरुप को पहचान कर अपनी सम्पूर्ण मानवीय क्षमताओं को विकसित करने में सहायता करता है।