International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN No. : XXXX – XXXX
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline : +91 – 8368 241 690
Mail to Editor: [email protected]
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Author(s): मीनाक्षी कोठारी, डॉ. शोभा पाण्डेय
श्रीमद्भागवत महापुराण में जहाँ एक ओर ज्ञानयोग के अन्तर्गत समस्त वृत्तियों से परे निर्गुण ब्रह्म तत्व का विवेचन हुआ है कर्मयोग के अन्तर्गत कर्म को फलभोग का हेतु माना गया है वहीं उपनिषदों और पातंजल योगसूत्र के अष्टांगयोग का प्रतिनिधित्व भी श्रीमद्भागवत महापुराण प्रमुखतः से करता है, इसमें वर्णित अष्टांगयोग में भी भक्ति का सम्पुट है, इस तरह यह राजयोग और भक्तियोग का अनूठा समन्वय प्रस्तुत करता है, प्रस्तुत शोधकार्य में शोधार्थिनी का उद्देश्य जनसाधारण को श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित योग की विविध धाराओं से अवगत कराना तथा इस सहज मार्ग की ओर जीवन की दिशा धारा को प्रेरित कराना है।
योग एक सनातन विज्ञान है जिसे ब्रह्मा द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, यह एक ऐसी साधना-पद्धति है जो मनुष्य को समस्त आवरणों और मानसिक विक्षेपों से मुक्त कर उसे ऐसा विशुद्ध अंतःकरण प्रदान करती है कि वह परमात्मा से सहज रूप से जुड़ जाता है, पौराणिक ग्रंथों में ऋषियों ने इसी योग के लक्ष्य को अत्यंत सरल और बोधगम्य रूप में आम जनमानस के समक्ष प्रस्तुत किया है।