International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डॉ.अमित कुमार पाण्डेय
भारतीय धर्मशास्त्रीय परम्परा में अभिवादनशीलता को सदाचार एवं धर्म का अनिवार्य अंग माना गया है। स्मृति, महाकाव्य एवं पुराण-साहित्य में यह प्रतिपादित किया गया है कि गुरुजनों, वृद्धों तथा श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति विनयपूर्वक अभिवादन करने से आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है। मनुस्मृति, महाभारत, उपनिषद् एवं पुराणों में अभिवादनशीलता को लौकिक तथा पारलौकिक उन्नति का साधन स्वीकार किया गया है। महामुनि मार्कण्डेय इस शास्त्रीय सिद्धान्त के आदर्श प्रतिमान हैं। नित्य विप्र-सेवा, विनय एवं अभिवादनशील आचरण के फलस्वरूप उन्हें ब्रह्मा एवं भगवान् शंकर से अजर-अमरत्व, त्रिकालज्ञान तथा पुराणाचार्यत्व का वरदान प्राप्त हुआ। प्रस्तुत शोध-पत्र में अभिवादनशीलता की शास्त्रीय अवधारणा का विवेचन करते हुए महामुनि मार्कण्डेय के जीवन-प्रसंग के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि अभिवादनशीलता केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, अपितु अमरत्व की साधना भी है।