International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): अनीता पुनेडा
प्रत्येक संस्कृति का मूल आधार उसके देवता होते हैं। इन देवताओं को मंदिरों में मूर्तियों, लिंगों या पत्थरों में देवत्व आकार देकर पूजा जाता है। लेकिन प्राचीन हडप्पा और वैदिक काल में मंदिरों का कोई प्रमाण नहीं मिलता, जो प्रकृति पूजा के प्राधान्य को दर्शाता है। हिमालयी क्षेत्र प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक रूप से समृद्ध रहा है। यह देवी-देवताओं तथा ऋषि-मुनियों के आस्था का केन्द्र था, जहाँ विश्राम स्थल और समाधियाँ तथा देव मूर्तियों के लिए थान अथवा मंदिर बनाये गये। ऐतिहासिक काल में विभिन्न जातियों के आवागमन से यहाँ अनेक संस्कृतियाँ और धार्मिक स्थल विकसित हुए, जिन्हें प्राचीन ग्रन्थों में देवालय, देवगृह, देवागार, देवकुल, देवायतन, देवाल, द्योल, देवस्थान आदि नाम दिया गया है, जिनसे देवताओं के निवास स्थान का बोध होता है। धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पत्थरों के साथ-साथ इष्टिकाओं का भी उपयोग किया जाने लगा। गुप्तकाल से उत्तराखण्ड में वास्तु आधारित आयताकार एवं वर्गाकार मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ। यहाँ मंदिरों का अस्तित्व के प्रमाण पाँचवीं शताब्दी से मिलते हैं, जहाँ अधिकांश मंदिर पत्थरों एवं इष्टिकाओं से निर्मित थे।
ऐसा माना जाता है कि मंदिर स्थापत्य कला के लिए पाषाण से बने मंदिरों के निर्माण से़ पूर्व लकड़ी का प्रयोग किया जाता होगा क्योंकि इसका एकमात्र सुरक्षित प्रमाण उत्तरकाशी है जहाँ से आज भी काष्ठ युक्त मंदिर प्राप्त होते हैं। पिथौरागढ़ की विषम भौगोलिक परिस्थिति में भी कुणिन्द, कत्यूरी, चन्द, मल्ल, बम एव रजवारों ने स्थानीय तौर पर शासन किया। जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला एवं संस्कृति में अपनी अमिट छाप छोड़ी। ऐसे भौगोलिक विषमता वाले स्थानों पर मंदिर बनाकर और उनमें विशाल मूर्तियों को स्थापित करके अपने अमिट साहस को प्रस्तुत किया। आधुनिक उपकरणों एवं मशीनरी के अभाव में भी मंदिरों एवं भवनों पर लकड़ी की महीन कारीगरी करना भी उस समय के कलाकारों की कल्पना शक्ति के विस्तार का उदाहरण प्रस्तुत करती है। इनकी स्थिति एवं बनावट को देखकर ऐसा लगता है मानो कलाकार के हाथों एवं बुद्धि में स्वयं देवता विश्वकर्मा विराजमान हो गये हों।