International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): हेमलता त्रिवेदी, प्रो. मीना गुप्ता
भारतीय विचारधारा में भगवती गंगा के प्रति राष्ट्र के हृदय में इतनी गहरी आस्था ज्ञात होती है कि वह सभी नदियों को गंगा शब्द से संबोधित करते हैं ।वह चाहे ब्रह्मपुत्र, कावेरी, नर्मदा और गोदावरी हो अथवा उसकी सहायक सरिताएं यमुना, सरयू, गण्डकी आदि कोई भी हो ।सभी में भगवती गंगा की पवित्रता और महिमा के भाव से भावित होकर भक्त उसके निर्मल जल में स्नान कर अपने जीवन को धन्य बनाता है इसलिए भगवान श्री कृष्ण चंद्र के मुखारविंद से निकलकर पियूषवाग्धारा श्रीमद्भगवतगीता के माहात्म्य में गीता के ज्ञान- प्रवाह को भी गंगासदृश स्वीकार किया गया है- "गंगागंगोदकम् पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते"।।
भगवती गंगा नदी है, नारी हैं, देवी हैं। इसके अतिरिक्त अन्य शब्द हैं।गंगा शब्द की व्युत्पत्ति दो धातुओं गम् और गै धातु से निष्पन्न है। गम् गतो प्राप्तौ गच्छति+ कि्वप प्रत्यय गै शब्दे गायति+ डा= गंगा। गच्छतीति गायतीति गंगा। गच्छति गायति गंगेति। जो सर्वत्र गमन करे, सबको प्राप्त हो तथा जिससे शब्द उत्पन्न हो वह गंगा है इसी प्रकार गंगा शब्द में दो गुणधर्म है- गति और शब्द अर्थात गंगा शब्द में गतिब्रहत तथा शब्द ब्रहत का सतत निवास रहता है। जिस किसी भी प्रवाह में ये दो तत्व सदा रहते हो वह गंगा है।इन दो गुणों से युक्त हर प्रवाह गंगा है। गंगा शब्द स्त्रीलिंग का सूचक है।