International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डॉ. मंजू सिंह ठाकुर
बौध्द दर्शन भारतीय दार्शनिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। बौध्द दर्शन का मुख्य उद्देश्य मानव जीवन के दुःखों का निवारण तथा निर्वाण की प्राप्ति है। बौध्द धर्म का द्वादश निदान का सिध्दांत संसार, दुःख तथा पुर्नजन्म की प्रक्रिया को समझाने वाला आधारभूत सिध्दांत है।
महात्मा बुध्द इस जगत को प्रतीत्य समुत्पाद के नियम से ही संचालित मानते है। पेड़-पौधे, मनुष्य, देवता सभी कार्यक्षेत्र में कार्यकारण के नियम के अधीन है। इस जगत् के प्रत्येक क्षेत्र में कार्यकारण का नियम काम करता है। प्रतीत्य समुत्पाद बौध्द धर्म का मूल मन्त्र है। प्रतीत्य समुत्पाद के अनुसार इस जगत में प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण होता है। कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं हो सकता। इस जगत में जितनी भी घटनाएँ होती है, प्रत्येक घटना का कोई न कोई कारण होता है, बिना कारण के कोई भी घटना नही घट सकती यह समस्त जगत् घटना चक्र है। जब यह घटना घटती है जब इस घटना का उद्य होता है, तब उस अमुक घटना का उदय होता है। जब यह आमुक घटना नही होती तब वह घटना भी नहीं होती है, इस किसी घटना विशेष के अन्त हो जाने पर अमुक घटना विशेष का भी अन्त हो जाता है।
इस शोध पत्र का उद्देश्य द्वादश निदानों की दार्शनिक व्याख्या करना तथा यह स्पष्ट करना है कि, बौद्ध दृष्टिकोण में जगत की उत्पत्ति, परिवर्तन और नाश किस प्रकार कारण - कार्य - संबंध पर आधारित है।