International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): गुड्डी परवीन निसार अहमद खान, डाँ. सुमेध नागदेवे
आधुनिक साहित्य जगत की इन समस्त लेखिकाओं में उषा प्रियंवदा एक ऐसी आधुनिक लेखिका रही है जिन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से पारिवारिक, सामाजिक बंधनों एवं परंपराओं के कारण आधुनिक नारी के भीतर में उत्पन्न होनेवाले मनोभावों का चित्रण किया है। इनके पचपन खंभे लाल दीवारें, रुकोगी नहीं राधिका, शेषयात्रा, अन्तर्वंशी उपन्यासों में आधुनिक नारी के विभिन्न रुप दिखाई देते है। इनके उपन्यासों की नायिकाएँ शिक्षित होने के बावजूद भी पारिवारिक उत्तरदायित्वों एवं सामाजिक अपेक्षाओं के कारण अकेलापन अनुभूत करती है। बाहरी परिस्थितियों एवं भीतरी भावनाओं एवं इच्छाओं के मध्य उनके भीतर निरंतर अर्न्तद्वंद्व चलता रहता है। कभी वह प्रेम एवं विवाह जैसे बंधन को तुच्छ समझती है तो कभी उसी विवाह संबंध को बचाने की भरकस कोशिश भी करती है। उनके उपन्यासों की सुषमा, राधिका, अनु जैसी नायिकाएँ शिक्षित होने के कारण हर विपरित परिस्थिति में अपने स्वतंत्र अस्तित्व की प्राप्ति हेतु संघर्ष करती हुई नजर आती है। स्वदेशी एवं विदेशी परिवेश में संघर्ष द्वारा वह अपने व्यक्तित्व को नया रुप देने में सफल होती दिखाई देती है। आधुनिक नारी स्वाभिमानी होने के कारण अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सचेत एवं जागरुक है और वह आर्थिक रुप से स्वतंत्र बनकर अपनी समस्याओ को स्वंय हल करना भी जानती है। यही आर्थिक मजबूती आधुनिक नारी के भीतर आत्मनिर्भरता का भाव निर्माण करने में सक्षम है। उषा के उपन्यासों की नारी भारतीय संस्कार एवं परंपराओं से बंधी होने पर भी परंपरा एवं आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करती है। इसके साथ ही उषा प्रियंवदा ने परिवार, समाज एवं राष्ट्र में आधुनिक नारी की स्थिति का चित्रण भी अत्यंत सहज और स्वाभाविक तरीके से किया है।