International Journal of Multidisciplinary Horizon
ISSN: 3049 – 2017
Impact Factor (RJIF): 7.8
Peer Reviewed Journal
Author’s Helpline: +91 – 8368 241 690
Email: [email protected] / [email protected]
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Author(s): डॉ. पुष्पेन्द्र जोशी
भारतीय संस्कृति में अग्नि केवल एक भौतिक पदार्थ अथवा दहन की प्रक्रिया नहीं है। अग्नि भारतीय परम्परा में जीवन, प्रकाश, ऊर्जा, यज्ञ, पाचन, परिवर्तन, ज्ञान और चेतना की प्रतीकात्मक तथा तात्त्विक सत्ता है। वैदिक वाङ्मय में अग्नि को सर्वप्रथम देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया और ऋग्वेद का प्रथम मन्त्र ही अग्नि की स्तुति से प्रारम्भ होता है। यास्काचार्य ने निरुक्त में अग्नि को ‘अग्रणी’ कहा है। उपनिषदों में अग्नि/तेजस् सृष्टि-प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। सांख्य और वैशेषिक दर्शन में तेजस् का तात्त्विक विश्लेषण मिलता है। भगवद्गीता में अग्नि को भगवान् की प्रकृति का एक तत्त्व तथा वैश्वानर रूप में प्राणियों के शरीर में स्थित पाचक शक्ति बताया गया है। आयुर्वेद में जठराग्नि, भूताग्नि तथा धात्वाग्नि की अवधारणा शरीर में होने वाली रूपान्तरण-प्रक्रिया को समझने का आधार प्रदान करती है।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य अग्नि को केवल धार्मिक प्रतीक के रूप में देखने के स्थान पर उसके वैदिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक, दार्शनिक तथा आयुर्वैदिक स्वरूप का समन्वित अध्ययन करना है। साथ ही यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि प्राचीन भारतीय ‘अग्नि’ और आधुनिक विज्ञान की ‘ऊर्जा’ को पूर्णतः समान मानना उचित नहीं है, यद्यपि प्रकाश, ताप और रूपान्तरण जैसे कुछ स्तरों पर दोनों के मध्य सार्थक तुलनात्मक विमर्श किया जा सकता है।