Author(s): डॉ. पवनकुमार मिश्र
Abstract:
१८वीं शताब्दी के भारत में जब दूरबीन और आधुनिक उपकरणों का प्रचलन नहीं था, आमेर-जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने खगोलशास्त्र को व्यवहारिक विज्ञान के रूप में स्थापित किया। १७२४-१७३८ के बीच उन्होंने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में पाँच वेधशालाओं का निर्माण कराया, जिन्हें ‘जंतर-मंतर’ कहा जाता है। इनमें जयपुर की वेधशाला सबसे बड़ी और पूर्ण संरक्षित है। २१वीं सदी में जब भारत चंद्रयान, आदित्य-एल1 और गगनयान जैसे मिशनों से अंतरिक्ष महाशक्ति बन रहा है, तब ये पत्थर-चूने की वेधशालाएँ केवल स्मारक नहीं, अपितु विज्ञान, शिक्षा, संस्कृति और सतत विकास की दृष्टि से पुनः प्रासंगिक हो रही हैं और “सविता यन्त्रै: पृथिवीमरभ्णात्” यह वैदिकोक्ति अपने मूल सन्दर्भों के प्रति सहजरूप से जिज्ञासा में वृद्धि भी कर रही है।
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