अभिराज राजेन्द्र मिश्र के यात्राकाव्यों में सौन्दर्यबोध

Author(s): निहारिका धाकड़, डॉ. अनीता

Abstract:

यात्रा शब्द की व्युत्पत्ति ‘या’ धातु में ‘ष्ट्रन’ प्रत्यय करके हुई है। भ्रमणशील मानव ने साहित्यिक मनोवृत्ति से प्रेरित होकर विशिष्ट स्थलों की यात्राओं से उत्पन्न अनुभवों को काव्यात्मक रूप में लिपिबद्ध किया। संस्कृत साहित्य में यही परंपरा ‘यात्राकाव्य’ रूप में समृद्ध हुई। आधुनिककाल में यात्राएँ केवल भौगोलिक भ्रमण तक सीमित न रहकर अनुभव, संवेदनाएँ एवं सौंदर्यबोध का गहन चित्रण प्रस्तुत करती हैं। साहित्य में सौंदर्यबोध प्रकृति के सौंदर्य, मानवीय अनुभवों की गहराई एवं आत्मिक अनुभूतियों के रूप में सम्भूत हुआ। काव्यशास्त्र में सौंदर्य का अनुभव मुख्यत: रस, अलंकार, छंद एवं ध्वनि के माध्यम से प्रविष्ट होता है। संस्कृत साहित्यानुरागियों के हृदयसम्राट् अभिराज राजेन्द्र मिश्र अद्भुत व्यक्तित्व एवं विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे हैं। उनके यात्राकाव्यों में वर्णित प्रकृति का सौन्दर्य, मानवीय अनुभवों की गहराई एवं आत्मिक अनुभूतियाँ मानव को उत्कृष्ट अनुभूति प्रदान करती हैं। अभिराज राजेन्द्र मिश्र के यात्राकाव्यों में प्रकृति सजीव पात्र के रूप में बाह्य एवं आध्यात्मिक सौंदर्य का अनुभव करती है। प्रकृति के अद्भुत दृश्य का वर्णन करते हुए वह कहते हैं, कि ‘न्यान’ ग्राम के श्मशान में न तो मृत शरीरों को जलाया जाता है और न ही उन्हें दफनाया जाता है, किंतु श्मशान में उपस्थित वृक्षों की महिमा के कारण अग्नि और गंध श्वत: ही धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है-

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