भिक्षु-गीता का दार्शनिक महत्त्व व जीवन में प्रासंगिकता।

Author(s): आदेश नौडियाल

Abstract:

प्रस्तुत शोध-पत्र में भिक्षु गीता के दार्शनिक पक्षों का विवेचन किया गया है। यह गीता काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छह वर्गों पर विजय प्राप्त करने का उपदेश देती है। यह मन ही संसार रूपी चक्र को निर्देशित करता है, अत: मन की प्रधानता इस गीता का केन्द्र है, जब साधक मन को समझने में अक्षम होते हैं, तो वह दुःख का कारण देव, आत्मा, ग्रह, कर्म तथा कालादि को समझने लगते हैं। ये सभी कारण मन द्वारा आरोपित है, वस्तुत: मन ही जीव मात्र के सुख-दु:ख का कारण है। मनोजय के उपायों में तितिक्षा, भोग रहित उपभोग, योग के अष्टाङ्ग मार्ग तथा क्षमा के मार्ग को सम्मिलित किया गया है। आधुनिक जीवन शैली में मानसिक स्वास्थ्य तथा कर्म-बन्धनों से छुटने पर ही मनुष्य अपने जीवन को प्रासङ्गिक बनाने में सक्षम हो सकता है, इन विषयों को इस शोध-पत्र में समायोजित किया गया है।

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